यमुना जल समझौते ने बदली तस्वीर, तीन दशक बाद राजस्थान को मिली बड़ी राहत
नई दिल्ली। तीन दशकों के लंबे इंतजार और कई प्रशासनिक पेचचिदगियों को पार करने के बाद आखिरकार यमुना नदी के पानी के बंटवारे को लेकर राजस्थान और हरियाणा के बीच एक नया और ऐतिहासिक अध्याय शुरू हो गया है। नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में दोनों राज्यों के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (MoA) पर हस्ताक्षर किए गए। इस नए समझौते से राजस्थान के शेखावाटी अंचल के अंतर्गत आने वाले चूरू, सीकर और झुंझुनूं जिलों की दशकों पुरानी पेयजल और सिंचाई की किल्लत दूर होने की बड़ी उम्मीद जगी है। हालांकि, इस समझौते के धरातल पर उतरने के साथ ही प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी का दौर भी तेज हो गया है।
यमुना जल विवाद और समझौते का लंबा इतिहास
इस पूरे मामले की शुरुआत तीन दशक पहले हुई थी जब लंबे विवाद के बाद 12 मई 1994 को हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के बीच यमुना जल के बंटवारे को लेकर एक बुनियादी समझौता हुआ था। इसके ठीक एक साल बाद इस व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करने के लिए केंद्र सरकार के जल संसाधन मंत्रालय ने अपर यमुना रिवर बोर्ड और एक विशेष समीक्षा समिति का गठन किया। साल 2000 में जब उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड नया राज्य बना, तो उसके मुख्यमंत्री को भी इस समीक्षा समिति और बाद में बोर्ड में शामिल किया गया। राजस्थान को साल 2012 में अधिकारिक तौर पर पानी में हिस्सा तो मिल गया था, लेकिन पाइपलाइन और जरूरी बुनियादी ढांचा न होने के कारण यह योजना बरसों तक कागजों में ही दबी रही। इसके बाद फरवरी 2024 में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच प्रारंभिक सहमति बनी और अब जून 2026 में इस अंतिम कार्ययोजना पर अंतिम मुहर लग पाई है।
परियोजना का स्वरूप और प्रशासनिक ढांचा
इस पूरी व्यवस्था के संचालन की निगरानी केंद्रीय जल आयोग के एक वरिष्ठ सदस्य द्वारा की जाती है जो बोर्ड के अंशकालिक अध्यक्ष के रूप में काम करते हैं। इसके साथ ही पांचों संबंधित राज्यों के मुख्य अभियंता स्तर के अधिकारी और प्रदूषण नियंत्रण, भूजल तथा विद्युत क्षेत्र के केंद्रीय विशेषज्ञ इसके सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं। इस पूरी विशाल परियोजना की कुल अनुमानित लागत लगभग 34,102 करोड़ रुपये तय की गई है। इसके तहत हथिनीकुंड बैराज से शुरू होकर चूरू जिले के हंसियावास जलाशय तक लगभग 295.5 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन बिछाई जाएगी। इस पूरी कार्ययोजना में तीन बड़ी भूमिगत पाइपलाइन, निरीक्षण के लिए सड़कें, कृत्रिम जलाशय और आधुनिक जल प्रबंधन प्रणालियां विकसित की जाएंगी, जिससे राजस्थान के शेखावाटी और भरतपुर के साथ-साथ हरियाणा के भी दस प्रमुख स्थानों पर जलापूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी। इस कार्य को पारदर्शी तरीके से पूरा करने के लिए दोनों राज्यों के समन्वय से एक विशेष संस्था का गठन किया जा रहा है।
समझौते के प्रावधानों पर शुरू हुई तीखी राजनीति
इस ऐतिहासिक समझौते पर मुहर लगने के बाद जहां सत्ता पक्ष में उत्साह का माहौल है, वहीं विपक्ष ने इसे लेकर पारदर्शिता के सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के जयपुर लौटने पर सत्ताधारी दल द्वारा भव्य स्वागत और रोड शो किया गया, जहां मुख्यमंत्री ने दावा किया कि उनकी सरकार ने बरसों से लंबित योजना को आगे बढ़ाकर शेखावाटी के किसानों की तकदीर बदलने वाला काम किया है। दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस नए समझौते के दस्तावेजों को तुरंत सार्वजनिक करने की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता के तहत जनता को यह जानने का पूरा हक है कि यह समझौता किन शर्तों पर हुआ है। कांग्रेस ने आशंका जताई है कि यदि इस समझौते में 1994 के मूल नियमों के विपरीत हरियाणा को किसी प्रकार की विशेष प्राथमिकता दी गई है, तो यह राजस्थान के हक के साथ समझौता होगा, इसलिए सरकार को इसकी प्रति जनता के सामने रखनी चाहिए।
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