नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद राज्य में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक बड़ी बगावत शुरू हो गई है। दावा किया जा रहा है कि पार्टी के 91 से अधिक स्थानीय पार्षदों ने एक साथ सामूहिक इस्तीफा दे दिया है। इस घटनाक्रम के बाद से सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।

इस्तीफे के दावे से मची राजनीतिक खलबली

बड़ी संख्या में स्थानीय पार्षदों (Councillors) के एक साथ पद छोड़ने की खबर से बंगाल के नगर निकायों में हड़कंप मच गया है। बताया जा रहा है कि कई पार्षद पार्टी की कार्यशैली और नेतृत्व से नाराज चल रहे थे। हाल ही में हुए चुनावों के बाद बदले राजनीतिक माहौल को देखते हुए इन पार्षदों ने टीएमसी से अलग रास्ता चुनने का फैसला किया। इस बगावत के बाद से स्थानीय स्तर पर पार्टी के वजूद और उसकी मजबूती को लेकर कई तरह के सवाल खड़े होने लगे हैं।

चुनाव के बाद तेजी से बदले राजनीतिक समीकरण

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालिया चुनावी नतीजों ने राज्य की जमीनी राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। नगर निगमों और नगर पालिकाओं में मजबूत पकड़ रखने वाले नेताओं की भूमिका अब पहले से कहीं ज्यादा अहम हो गई है। ऐसे में पार्षदों का यह सामूहिक इस्तीफा न सिर्फ टीएमसी के संगठन को कमजोर कर रहा है, बल्कि इससे कई नगर निकायों में प्रशासनिक कामकाज और आम जनता से जुड़ी नागरिक सुविधाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

भ्रष्टाचार की जांच और कार्रवाई का डर

सियासी गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कुछ नगर निकायों में हुए वित्तीय घोटालों और प्रशासनिक गड़बड़ियों की जांच तेज हो गई है। कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई के बढ़ते दबाव के कारण भी स्थानीय नेताओं में भारी बेचैनी देखी जा रही है।

विपक्षी दलों का कहना है कि यह तो सिर्फ शुरुआत है, क्योंकि जनता अब भ्रष्टाचार का हिसाब मांग रही है। वहीं दूसरी तरफ, टीएमसी के कुछ नेताओं का आरोप है कि विपक्ष इस स्थिति का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है और पार्षदों से जबरन इस्तीफे दिलवाए जा रहे हैं।

टीएमसी के मजबूत गढ़ों में बिखराव

पश्चिम बंगाल के स्थानीय निकायों पर पिछले कई सालों से तृणमूल कांग्रेस का एकतरफा दबदबा रहा है। चाहे नगर निगम हों या नगर पालिकाएं, टीएमसी के संगठनात्मक ढांचे को बेहद मजबूत माना जाता था। लेकिन एक साथ इतने बड़े पैमाने पर पार्षदों के इस्तीफे ने इस मजबूत किले में बड़ी दरार डाल दी है और अब पार्टी के सामने अपने इस जमीनी संगठन को बचाने की बड़ी चुनौती है।